मगर यह भी सोचने वाली बात है कि इसके जवाब में नेतनयाहू ने निर्णायक चुनाव में ट्रम्प की उस तरह मदद नहीं कि जिसकी ट्रम्प को ज़रूरत थी।
इस्राईली मीडिया को देखिए तो उसमें यह बात साफ़ नज़र आ रही है कि ट्रम्प नेतनयाहू से बहुत तपे हुए हैं और उनका समर्थन करने पर अब पछता रहे हैं क्योंकि अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के समय नेतनयाहू ने खुलकर ट्रम्प का समर्थन नहीं किया यानी ट्रम्प को धोखा दिया है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि इस मामले में नेतनयाहू की निंदा नहीं की जानी चाहिए बल्कि आलोचना ख़ुद ट्रम्प और उनकी मूर्खता की होनी चाहिए जिन्होंने नेतनयाहू पर भरोसा किया था और यह आस लगा बैठे थे कि नेतनयाहू उन्हें अमरीका में ज़ायोनियों और यहूदियों के वोट दिलवा देंगे।
नेतनयाहू ने दरअस्ल ट्रम्प को टिशू पेपर की तरह इस्तेमाल किया और फिर कूड़ेदान में फेंक दिया। अब नेतनयाहू की नज़रें जो बाइडन पर टिकी हुई हैं कि किस तरह उन्हें शीशे में उतारा जाए। 77 प्रतिशत यहूदियों ने बाइडन को वोट दिया है।
नेतनयाहू धोखा देने, ग़द्दारी करने और पीठ में छुरा घोंपने के माहिर हैं। यह तो ट्रम्प की ग़लती थी कि उन्होंने पिछले उदाहरणों से पाठ नहीं लिया।
ट्रम्प अब पछता रहे हैं लेकिन अभी पछताने वालों की एक लंबी लाइन तैयार होने वाली है जिसमें वह अरब नेता आगे आगे होंगे जिन्होंने इस्राईल के साथा समझौते किए। यह पछताएंगे और ख़ूब पछताएंगे मगर इस पछतावे से कुछ बदलने वाला नहीं है।
स्रोतः रायुल यौम